चरित्र निर्माण की सदी – 2 : संघ परिवार गोलवलकर को ‘विस्मृत’ क्यों करना चाहता है?

‘भविष्य का भारत’

अगर हम पीछे मुड़कर देखें तो नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री के रूप में पहले कार्यकाल के दौरान आरएसएस द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम जो संगठन के पूरे इतिहास में अपनी तरह का पहला कार्यक्रम था—इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।

इसके तहत आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला का शीर्षक था ‘भविष्य का भारत’, जिसका आयोजन स्वयं आरएसएस ने राष्ट्रीय राजधानी में किया था, जिसमें उसके सर्वोच्च नेता मोहन भागवत मुख्य वक्ता थे।

इसे अपनी तरह का पहला कार्यक्रम—एक जनसंपर्क अभियान—बताया गया था, जिसका उद्देश्य संघ के विभिन्न मुद्दों पर दृष्टिकोण को स्पष्ट करना, उसकी विचारधारा और कार्यप्रणाली को लेकर फैली भ्रांतियों को दूर करना था। इसी उद्देश्य से समाज के विभिन्न क्षेत्रों से लोगों को इसमें आमंत्रित किया गया था।

जब यह समाचार आया कि संघ प्रमुख सीधे अमेरिका से दिल्ली पहुँच रहे हैं—जहाँ वे शिकागो में स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक भाषण की 125वीं वर्षगाँठ के समारोह में भाग लेने गए थे—तो इस प्रतीकात्मकता पर लोगों का ध्यान गया।

यह दर्ज है कि ‘भविष्य का भारत’ विषय पर आयोजित इस तीन दिवसीय व्याख्यानमाला का अनेक टीवी चैनलों पर सीधा प्रसारण हुआ और टिप्पणीकारों के बीच मानो ‘बदले हुए आरएसएस’ की प्रशंसा करने की होड़ लग गई।

अनेक उदारवादी भी इस भिन्न प्रकार के हिंदुत्व से प्रभावित दिखाई दिए, जहाँ वर्तमान सरसंघचालक ने स्वतंत्रता संग्राम में कांग्रेस की भूमिका की सराहना की या यहाँ तक कि उस भाषण का उल्लेख किया जो कथित रूप से सर सैयद अहमद ने आर्य समाज द्वारा सम्मानित किए जाने के अवसर पर दिया था। शायद उनके लिए यह भी आश्वस्त करने वाला था कि अपने भाषण में उन्होंने संविधान की प्रशंसा की और उसी क्रम में यह भी कहा कि “हिंदू राष्ट्र का अर्थ यह नहीं है कि उसमें मुसलमानों के लिए कोई स्थान नहीं है।”

“हम भारतीय संविधान का सम्मान करते हैं। इसे बनाने में बहुत विचार किया गया है। यह सर्वसम्मति से बनाया गया था। संघ कभी भी संविधान के विरुद्ध नहीं गया।”

दिलचस्प बात यह थी कि भागवत ने भारतीय संविधान के बारे में सकारात्मक बातें कहीं, उसकी रचना में लगे विचार और प्रयास की सराहना की, यह भी कहा कि पूरा कार्य ‘सर्वसम्मति’ से हुआ था, और यह भी रेखांकित किया कि उनका संगठन अब उसका सम्मान करता है।

सुनने में यह सब बहुत अच्छा लगा।

लेकिन भागवत की ओर से यह स्पष्ट करना आवश्यक था कि आखिर आरएसएस ने संविधान का ‘सम्मान’ करना कब शुरू किया, क्योंकि इससे कुछ ही महीने पहले उन्होंने स्वयं हैदराबाद में अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद को संबोधित करते हुए “[दे]श की मूल्य–व्यवस्था के अनुरूप संविधान और न्यायशास्त्र में परिवर्तन” की वकालत की थी।

उनसे यह भी पूछा जा सकता था कि हिंदू राष्ट्र की पूरी अवधारणा—जो एक विशेष धर्म के लोगों की श्रेष्ठता पर आधारित है—संविधान के साथ कैसे संगत हो सकती है, जबकि संविधान प्रत्येक व्यक्ति को उसके धर्म, लिंग, जाति, क्षेत्र या नस्ल की परवाह किए बिना समान अधिकार और अवसर की गारंटी देता है। एक पूरक प्रश्न यह भी हो सकता था कि “हिंदू राष्ट्र में मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों का स्थान क्या होगा?”

क्या वह स्थान निज़ाम–ए–मुस्तफ़ा या किसी इस्लामी राष्ट्र में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति के समान होगा, या उससे भिन्न? क्या अल्पसंख्यक बहुसंख्यक हिंदुओं की ‘कृपा’ पर ही जीवन बिताते रहेंगे—जैसा कि भागवत के पूर्ववर्तियों ने दावा किया था—एक औपचारिक पदानुक्रमित संबंध में, मूलतः द्वितीय श्रेणी के नागरिकों के रूप में? या उन्हें भी राष्ट्र पर समान अधिकार प्राप्त होंगे?

क्या उन्हें अब भी ‘आंतरिक शत्रु’ घोषित किया जाएगा, जैसा कि दूसरे सरसंघचालक गोलवलकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Bunch of Thoughts में प्रतिपादित किया था?

दिलचस्प बात यह भी थी कि भागवत ने अपने भाषण में बड़े ज़ोर देकर कहा कि आरएसएस एक ‘लोकतांत्रिक संगठन’ है, जो कथित रूप से अपने किसी भी सहयोगी संगठन पर “रिमोट कंट्रोल” नहीं चलाता और न ही “वर्चस्व” स्थापित करने की आकांक्षा रखता है।

यह अलग बात है कि आरएसएस आज भी देश की लगभग आधी आबादी—अर्थात महिलाओं—को समान सदस्य के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है, जिससे वह मूलतः हिंदू पुरुषों का संगठन बना रहता है। अब यह इतिहास का हिस्सा है कि नागपुर की ही लक्ष्मी केलकर, जो स्वयं डॉ. हेडगेवार की समकालीन थीं और संगठन द्वारा किए जा रहे हिंदू एकता के कार्य से प्रभावित थीं, उन्होंने हेडगेवार से अनुरोध किया था कि महिलाओं को भी संगठन में शामिल होने दिया जाए। इस प्रस्ताव को डॉ. हेडगेवार ने तत्काल अस्वीकार कर दिया और उन्हें महिलाओं के लिए अलग संगठन बनाने की सलाह दी।

एक क्षेपक के तौर पर इस बात का उल्लेख करना मौजूं होगा कि इस मोर्चे पर – अर्थात स्त्रियों को संगठन में शामिल न करने के मसले पर – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मिस्र में बने संगठन ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ जैसा दिखता है, जिसका निर्माण (1928) हसन अल बन्ना ने किया था।  इसने भी अपनी ‘भगिनी ब्रिगेड ‘ का निर्माण किया है और अपने विशाल दायरे में फैले उसके पितृसंगठन में एक भी स्त्री को स्थान नहीं दिया गया है। 

अंत में, उस ‘ऐतिहासिक जनसंपर्क कार्यक्रम’ में उपस्थित लोगों और विश्लेषकों को सबसे अधिक आश्चर्य इस बात पर हुआ कि मोहन भागवत ने स्वयं आरएसएस के दो वरिष्ठ नेताओं—दूसरे सरसंघचालक गोलवलकर (21 जून 1940 – 5 जून 1973) और तीसरे सरसंघचालक बालासाहेब देवरस (5 जून 1973 – मार्च 1994)—के बारे में लगभग पूर्ण मौन बनाए रखा।

आख़िर ऐसी क्या बात थी जिसने उन्हें उनके नाम और कार्यों का उल्लेख तक करने से रोक दिया, जबकि वे ‘परिवार’ के बाहर के अनेक लोगों का उल्लेख करने में काफ़ी उदार थे?

एक प्रमुख अंग्रेज़ी दैनिक के संवाददाता/विश्लेषक ने तो यह भी गिना कि भागवत ने “अपने पहले दो दिनों के व्याख्यानों में 32 अलग–अलग व्यक्तित्वों का कुल 102 बार उल्लेख किया, ताकि यह दिखाया जा सके कि संघ विविध स्रोतों की श्रेष्ठ बातों को आत्मसात करता है।” वहीं आरएसएस के संस्थापक “के. बी. हेडगेवार का सबसे अधिक बार उल्लेख हुआ” और भागवत ने “महात्मा गांधी, बी. आर. आंबेडकर, मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सुभाष चंद्र बोस, वीर सावरकर, एम. एन. रॉय, एएमयू के संस्थापक सर सैयद अहमद ख़ान तथा कुछ कम प्रसिद्ध संघ नेताओं के साथ–साथ बुद्ध, ज़रथुस्त्र, रामकृष्ण परमहंस, दयानंद सरस्वती, विवेकानंद, गुरु नानक और शिवाजी” का भी उल्लेख किया।

रिपोर्टों के अनुसार गोलवलकर का उल्लेख तीसरे दिन प्रश्नोत्तर सत्र के दौरान हुआ। संगठन के तीसरे सरसंघचालक बालासाहब देवरस की स्थिति तो और भी दयनीय रही—उनका नाम तक नहीं लिया गया।

यह समझ से परे प्रतीत हो सकता है कि संगठन का वर्तमान सर्वोच्च नेता ‘भारत के भविष्य’ पर अपने विचार रखते हुए, संगठन से किसी भी प्रकार से जुड़े न रहने वाले लोगों को उसके ‘बदले हुए स्वरूप’ के बारे में समझाने का प्रयास करते हुए, संस्थापक और प्रथम सरसंघचालक पर विशेष ध्यान केंद्रित करता है, अनेक ऐसे लोगों का उल्लेख करता है जो या तो संगठन से जुड़े नहीं थे या उसकी गतिविधियों के आलोचक रहे थे, लेकिन उन दो प्रमुख नेताओं का नाम तक लेने से बचता है जिन्होंने लगभग आधी शताब्दी तक संगठन का नेतृत्व और मार्गदर्शन किया।

क्या यह चुप्पी अनजाने में थी, या फिर ‘परिवार’ का एक सोचा-समझा निर्णय?

संघ परिवार गोलवलकर को ‘विस्मृत‘ क्यों करना चाहता है?

अब यह इतिहास का हिस्सा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक सदस्य डॉ केशव बलिराम हेडगेवार ने स्वयं माधव सदाशिव गोलवलकर को अपनी मृत्यु के बाद संगठन का नेतृत्व करने के लिए नामित किया था, जिन्होंने आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक के तौर पर पदभार तुरंत संभाला था।

आरएसएस के अधिकांश विद्यार्थी इस तथ्य की अनदेखी कर देते हैं कि गोलवलकर औपचारिक रूप से 1937 में ही संगठन से जुड़े, वह भी एक टेढ़े-मेढ़े सफ़र से गुज़रने के बाद। उनके जीवनीकार यह भी बताते हैं कि वे पहले रामकृष्ण आश्रम  में शामिल होकर संन्यासी बनना चाहते थे। उन्होंने अपने गुरु से 1937 में दीक्षा भी प्राप्त की थी और इस प्रकार उस संन्यासी परंपरा में प्रवेश किया था। लेकिन बाद में उनका मन बदल गया और उन्होंने शीघ्र ही उसे छोड़ दिया।

हेडगेवार के मार्गदर्शन और उनके द्वारा प्रदान किए गए दृष्टिकोण के अंतर्गत ही संगठन के नए स्वयंसेवक गोलवलकर ने अपनी पहली और अत्यंत विवादास्पद पुस्तक We and Our Nationhood Defined (1938–39) लिखी। डॉ. हेडगेवार ने इसके प्रकाशन में विशेष रुचि ली थी और अपने व्यक्तिगत मित्र माधव श्रीहरि अणे, जो कांग्रेस पार्टी के नेता थे, से इसकी भूमिका लिखने का भी आग्रह किया।

संघ के भीतर गोलवलकर गुरुजी—जिन्हें लोकप्रिय रूप से इसी नाम से जाना जाता है—को संगठन का “प्रधान शिल्पकार” कहा जाता है और समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुँचने के लिए संबद्ध (अनुषांगिक) संगठनों का नेटवर्क बनाने की संगठन की विशिष्ट पद्धति का श्रेय उन्हें दिया जाता है।

बालासाहेब देवरस, जो आरएसएस के तीसरे सरसंघचालक बने —जो गोलवलकर से पहले संगठन में शामिल हुए थे और युवावस्था में ही एक संगठनकर्ता के रूप में उभरे थे—उन्हें इस बात के लिए याद किया जाता है कि उन्होंने आरएसएस को किसी भी अन्य सरसंघचालक की तुलना में सामाजिक सक्रियता से अधिक गहराई से जोड़ा और उसके जनाधार का विस्तार किया। हालांकि वे यह कार्य गोलवलकर की मृत्यु के बाद ही कर सके।

इस तथ्य को देखते हुए कि आरएसएस एक अत्यंत अनुशासित संगठन है, यह मान लेना अत्यधिक भोलेपन की बात होगी कि इन दोनों दिग्गजों को औपचारिक रूप से हाशिए पर डालना, तीन दिन की व्याख्यान शृंखला में उनके बारे में ठीक से बात न करना,  केवल मोहन भागवत  का व्यक्तिगत निर्णय रहा होगा।

अधिक संभावना यही प्रतीत होती है कि आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व के बीच इस बात पर सहमति बन गई थी कि जितनी अधिक चर्चा गोलवलकर या देवरस की होगी, उतना ही कठिन होगा डॉ. हेडगेवार की छवि को “महामानव” के रूप में प्रस्तुत करना।

माधव सदाशिव गोलवलकर की जयंती—जो आरएसएस द्वारा आयोजित उस “ऐतिहासिक संवाद” कार्यक्रम के एक वर्ष बाद आई—संघ परिवार के भीतर बदले हुए परिदृश्य का संकेतक मानी जा सकती है। इस पर व्यापक रूप से किसी का ध्यान नहीं गया।

एक राष्ट्रीय दैनिक में हिंदुत्व ब्रिगेड  के एक दूसरे दर्जे के नेता द्वारा लिखे गए एक इक्का-दुक्का लेख को छोड़ दें तो शीर्ष नेतृत्व में से किसी ने भी संघ  के दूसरे प्रमुख, जिन्होंने संगठन के संस्थापक के.बी. हेडगेवार के बाद नेतृत्व संभाला था, को याद करना भी आवश्यक नहीं समझा।

दिलचस्प बात यह रही कि ट्विटर पर सक्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के हुनर हाट में लिट्टी-चोखा खाने के अपने अनुभव पर तो ट्वीट किया, लेकिन उस दिन उनके टाइमलाइन पर गोलवलकर का एक भी उल्लेख नहीं था। यह कुछ अजीब लगा, क्योंकि अपनी पुस्तक ‘ज्योतिपुंज’ में – जिसका प्रकाशन जनाब मोदी के गुजरात मुख्यमंत्री पद के दौरान किया गया था – उन्होंने “महानतम समाजसेवियों” का जो वर्णन किया है जिन्होंने “मातृभूमि को आलोकित करने के लिए अपना जीवन जला दिया,” इसमें उन्होंने गोलवलकर पर चालीस पृष्ठ समर्पित किए थे।

उन्होंने लिखा था : “गोलवलकर गुरुजी का जीवन समर्पण का उत्कृष्ट उदाहरण है। गुरुजी में वे सभी गुण थे जिनकी अपेक्षा अपने लक्ष्य के लिए जीने वाले व्यक्ति से की जाती है—धैर्य, दृढ़ निश्चय और निरंतरता।” एक क्षेपक के तौर पर यह भी बता दें कि किताब का एक अध्याय संघ के वर्तमान सुप्रीमो मोहन भागवत के पिता पर भी  केंद्रित था – जो कुछ समय तक संघ की तरफ से राज्य का जिम्मा संभाल रहे थे।

क्या मोदी और उनके वरिष्ठ सहयोगियों की यह चुप्पी अनजाने में थी या जानबूझकर?

यह विश्वास करना कठिन है कि वे सभी मिलकर आरएसएस के सबसे लंबे समय तक (1940–1973) सरसंघचालक रहे व्यक्ति को अनजाने में भूल गए होंगे।

यह उस दौर से बिल्कुल अलग दृश्य था जब उनकी शताब्दी जयंती (2006) मनाई गई थी।

उस समय पूरे देश में ब्लॉक स्तर पर “हिंदू रैलियाँ” आयोजित करते हुए एक व्यापक अभियान चलाया गया था। सेमिनार, संगोष्ठियाँ और व्याख्यान आयोजित किए गए ताकि “श्री गुरुजी के विचारों और दृष्टि का प्रचार किया जा सके”, जैसा कि आरएसएस के मुखपत्र Organiser ने कहा था।

वह ऐसा दौर था जब “गोलवलकर का महिमामंडन” उन्हें “मानव स्तर से कुछ ऊपर” स्थापित कर रहा था, जैसा कि प्रो. जी. पी. देशपांडे, – जो अग्रणी मार्क्सवादी विचारक और नाटककार भी थे , तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में उस वक़्त अध्यापन कर रहे थे – ने उस समय Economic and Political Weekly में प्रकाशित एक लेख में लिखा था। देशपांडे “गोलवलकर” के नाम के साथ “श्री” जोड़ने की ओर संकेत कर रहे थे, जिसने उन्हें “लगभग पवित्र, किसी अवतार जैसा” बना दिया। 

“महाराष्ट्र के संदर्भ में इसका एक अतिरिक्त अर्थ या संकेत भी है। रहस्यवादी गुरुओं को प्रायः ‘श्री गुरुजी’ कहा जाता है। इस प्रकार आप देख सकते हैं कि गोलवलकर का अत्यंत सूक्ष्म महिमामंडन किया गया, और यह नया संबोधन उन्हें मानवीय स्तर से कुछ ऊपर स्थापित करता है।”( वही  )

तीन दिवसीय कार्यक्रम इस बात का स्पष्ट संकेत था कि “श्री गुरुजी” को धीरे-धीरे अदृश्य बनाने की यह प्रक्रिया किसी एक व्यक्ति का निर्णय नहीं थी। यह केवल भागवत का नहीं, बल्कि संघ परिवार के सभी प्रमुख नेताओं का सामूहिक विचार था कि सार्वजनिक रूप से उनके नाम का उल्लेख करने से बचा जाए।

इसका अंत कार्यक्रम के तीसरे दिन प्रश्नोत्तर सत्र में हुआ, जब यह दावा किया गया कि आरएसएस गोलवलकर की विवादास्पद पुस्तक Bunch of Thoughts का संशोधित संस्करण प्रस्तुत करना चाहता है, जिसमें मुसलमानों, ईसाइयों और कम्युनिस्टों को “आंतरिक ख़तरे” ( Internal Threats )  बताया गया है। इससे उनके नाम को लेकर सामूहिक असहजता की पुष्टि होती है।

“आंतरिक ख़तरे” शीर्षक वाला अध्याय, जिसमें “मुसलमान”, “ईसाई” और “कम्युनिस्ट” नामक तीन उपखंड हैं, इस प्रकार शुरू होता है:

“दुनिया के अनेक देशों के इतिहास ने यह दुखद शिक्षा दी है कि किसी देश के भीतर के शत्रुतापूर्ण तत्व राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बाहरी आक्रमणकारियों से कहीं अधिक बड़ा ख़तरा उत्पन्न करते हैं। दुर्भाग्य से राष्ट्रीय सुरक्षा का यह पहला पाठ वही है जिसे अंग्रेजों के इस देश से जाने के बाद से लगातार हमारे देश में अनदेखा किया गया है (sic)।”

इस पुस्तक में भारतीय संविधान, आरक्षण नीति तथा स्वतंत्रता संग्राम और उसके वीर प्रतिभागियों के बारे में भी समान रूप से विवादास्पद टिप्पणियाँ की गई हैं। भागवत अच्छी तरह जानते थे कि नए रूप वाले आरएसएस के लिए गोलवलकर द्वारा प्रस्तुत मानव-विरोधी समाधान—यद्यपि वे संगठन की सामूहिक सोच की अभिव्यक्ति थे—महँगे साबित होंगे।

आरएसएस के सामने सबसे उपयुक्त रास्ता यही था कि उन विचारों को व्यक्त करने वाले व्यक्ति को “अलग-थलग” कर दें । इसमें यह तथ्य भी सहायक था कि डॉ. हेडगेवार ने बहुत कम लिखा था, इसलिए उन्हें आलोचनात्मक जाँच-पड़ताल से अपेक्षाकृत आसानी से बचाया जा सकता था।

पुस्तक का नया संस्करण प्रकाशित करने के लिए भागवत द्वारा दिया गया स्पष्टीकरण बहुत अधिक विश्वसनीय नहीं लगा और उनकी दुविधा  को दर्शाता था।

“जहाँ तक Bunch of Thoughts का संबंध है, उसका प्रत्येक कथन अपने समय और परिस्थितियों के संदर्भ में है… उनके स्थायी विचार एक लोकप्रिय संस्करण में हैं, जिसमें हमने वे सभी टिप्पणियाँ हटा दी हैं जिनका संदर्भ केवल अस्थायी था और केवल उन्हीं बातों को रखा है जो युगों तक प्रासंगिक रहेंगी। आपको वहाँ (‘मुसलमान दुश्मन हैं’) जैसी टिप्पणी नहीं मिलेगी।”

एक विश्लेषक के अनुसार, यह वैसा ही है जैसे यह कहना कि हिटलर की विश्वविख्यात किताब Mein Kampf (मेरा संघर्ष) – जिसमें उनके नस्लवादी विचार ना केवल प्रगट होते हैं बल्कि वह साथ ही साथ उस ‘समस्या ‘ को सुलझाने की लिए ‘नस्लीय सफ़ाये ‘ की बात कर रहे हैं – का एक “स्वच्छ” संस्करण तैयार किया जा सकता है, जिसमें यहूदियों को निशाना बनाने वाले प्रत्यक्ष संदर्भ हटा दिए जाएँ ताकि “अधिक स्वीकार्य और प्रिय हिटलर” प्रस्तुत किया जा सके।

इस प्रकार यह समझना कठिन नहीं है कि संघ सार्वजनिक रूप से गोलवलकर से दूरी क्यों बनाना चाहता था।

यदि हम पंक्तियों के बीच पढ़ने का प्रयास करें, तो इसका अर्थ होगा—सार्वजनिक रूप से गोलवलकर से दूरी बनाना ताकि संगठन के प्रमुख विचारक और निर्माता, तथा गोलवलकर के वास्तविक शिक्षक डॉ. हेडगेवार को प्रश्नों और आगे की आलोचनात्मक जाँच से बचाया जा सके।

नफ़रत के गुरु!

गोलवलकर के जीवन की दिशा पर एक सरसरी नज़र डालने से यह बात और भी स्पष्ट हो जाती है।

याद रखिए, गोलवलकर का जीवन विश्व इतिहास के ऐसे कालखंड में फैला हुआ था जो कई दृष्टियों से अद्वितीय था। यह वह समय था जब नाज़ीवाद और फ़ासीवाद पश्चिमी यूरोप को अपनी चपेट में लेने के लिए तैयार थे; वह समय जब तीसरी दुनिया के अनेक देशों में राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष अपने निर्णायक चरण के निकट पहुँच रहे थे। यह वह दौर भी था जब सोवियत रूस में समाजवादी निर्माण के महान प्रयोग तथा कम्युनिस्ट नेतृत्व वाले उग्र आंदोलनों की उभरती लहर उस युग की प्रमुख विशेषताएँ सिद्ध हो रही थीं।

पश्चदृष्टि से देखें तो कहा जा सकता है कि यह विश्व इतिहास का वह मोड़ था जब सामंतवाद और उपनिवेशवाद की पुरानी दुनिया ढह रही थी और एक नई दुनिया उभर रही थी। यह कहना ग़लत नहीं होगा कि अपनी विशिष्ट Weltanschauung (विश्वदृष्टि) के कारण, जो “हिंदू धर्म की गौरवशाली परंपराओं” पर आधारित एक हिंदू राष्ट्र के निर्माण की आकांक्षा रखती थी, जो ब्रिटिश उपनिवेशवाद की तुलना में मुसलमानों को बड़ा प्रतिद्वंद्वी मानती थी, और जो नाज़ीवाद-फ़ासीवाद द्वारा किए गए “सामाजिक अभियांत्रिकी” के प्रयोगों से प्रेरणा लेती थी, गोलवलकर इस बात से अनभिज्ञ रहे कि दुनिया/मानवता एक बेहतर दिशा की ओर बढ़ रही थी।

जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, हिंदुत्व के उद्देश्य के लिए गोलवलकर का पहला सैद्धांतिक योगदान We or Our Nationhood Defined (1938) शीर्षक वाली एक पुस्तिका के रूप में सामने आया था। यह किताब हिटलर द्वारा यहूदियों के “जातीय शुद्धीकरण” की प्रशंसा में इतनी स्पष्ट थी और “विदेशी नस्लों” के हिंदू नस्ल में विलय की इतनी निर्लज्ज समर्थक थी कि बाद के आरएसएस नेताओं ने पूरी कोशिश की कि यह धारणा बनाई जाए कि यह पुस्तिका गोलवलकर द्वारा लिखी ही नहीं गई थी, बल्कि यह बाबाराव सावरकर की राष्ट्र मीमांसा का मात्र अनुवाद थी।

हालाँकि, यह एक अलग बात है कि We or Our Nationhood Defined की 22 मार्च 1939 की अपनी भूमिका में स्वयं गोलवलकर ने राष्ट्र मीमांसा को अपनी “प्रेरणा और सहायता के प्रमुख स्रोतों में से एक” बताया था। अमेरिकी विद्वान जीन ए. करन (मूलतः एक सीआईए व्यक्ति), जिन्होंने पचास के दशक की शुरुआत में आरएसएस पर विस्तृत अध्ययन किया, ने Militant Hinduism in Indian Politics: A Study of the RSS (1951) नामक एक पुस्तक लिखी, जो संघ के प्रति सहानुभूतिपूर्ण थी। इस किताब में उसमें उन्होंने पुष्टि की कि गोलवलकर की 77 पृष्ठों की यह पुस्तक 1938 में लिखी गई थी, जब हेडगेवार ने उन्हें आरएसएस का महासचिव नियुक्त किया था, और इसे आरएसएस की “बाइबल” कहा था।

तीसरा क्षेत्र जिसमें गोलवलकर अपने समय से बहुत पीछे दिखाई दिए, वह था मनुस्मृति  के आदेशों के प्रति उनका लगाव। जब नवस्वतंत्र भारत के नेता ऐसा संविधान बनाने के लिए संघर्ष कर रहे थे जो व्यक्तिगत अधिकारों की अक्षुण्णता पर आधारित हो और उन करोड़ों भारतीयों के लिए सकारात्मक भेदभाव (positive discrimination) के विशेष प्रावधान रखे जिन्हें धार्मिक ग्रंथों का हवाला देकर मानवीय अधिकारों से वंचित रखा गया था, तब गोलवलकर ने फिर उसी मनुस्मृति  को स्वतंत्र भारत का संविधान बनाने का समर्थन किया। 30 नवंबर 1949 को ऑर्गनाइज़र  ने शिकायत की:

“लेकिन हमारे संविधान में प्राचीन भारत की अद्वितीय संवैधानिक उपलब्धियों का कोई उल्लेख नहीं है। मनु के कानून स्पार्टा के लाइकर्गस या फ़ारस के सोलोन से बहुत पहले लिखे गए थे। आज भी ‘मनुस्मृति’ में प्रतिपादित कानून विश्व की प्रशंसा प्राप्त करते हैं और स्वाभाविक आज्ञापालन तथा अनुपालन उत्पन्न करते हैं। लेकिन हमारे संवैधानिक पंडितों के लिए इसका कोई महत्व नहीं है।”

जब चालीस के दशक के उत्तरार्ध में आंबेडकर और नेहरू के नेतृत्व में हिंदू कोड बिल के माध्यम से हिंदू महिलाओं को संपत्ति और उत्तराधिकार में सीमित अधिकार देने का प्रयास किया गया, तब गोलवलकर और उनके सहयोगियों ने इतिहास में पहली बार होने जा रहे हिंदू महिलाओं के इस ऐतिहासिक सशक्तिकरण का विरोध करने के लिए आंदोलन चलाने में कोई संकोच नहीं किया। उनका तर्क सरल था: यह कदम हिंदू परंपराओं और संस्कृति के प्रतिकूल है।

गोलवलकर की वैचारिक परियोजना की सीमाओं को उजागर करने वाले ऐसे अनेक उदाहरण गिनाए जा सकते हैं, जिन्होंने आधुनिक भारत के निर्माण में बाधा का काम किया। किसी भी निष्पक्ष पर्यवेक्षक के लिए यह स्पष्ट है कि जिस प्रकार उन्होंने धर्म के आधार पर भारतीय जनता की व्यापक एकता में विभाजन पैदा करने का प्रयास किया, जिस प्रकार उन्होंने पश्चिमी यूरोप में नस्लीय शुद्धीकरण के प्रयोगों की प्रशंसा की, और जिस प्रकार उन्होंने जीवनभर मनुस्मृति  का महिमामंडन किया, उससे यह सिद्ध होता है कि उनकी परियोजना मूलतः सामाजिक सद्भाव के उद्देश्य के प्रतिकूल थी।

यह अलग बात है कि सांप्रदायिक एजेंडा अपनाने के बावजूद भारतीय समाज को पुनर्गठित करने की गोलवलकर की परियोजना धीरे-धीरे ही सही, आगे बढ़ती रही। हमारे समाज के एक हिस्से को अपने पक्ष में करने में गोलवलकर की परियोजना की “सफलता” निश्चित रूप से इस टिप्पणी से परे अलग विश्लेषण की माँग करती है।

ऐसा नहीं था कि संघ ने उनकी दृष्टि पर पुनर्विचार किया हो; बल्कि उसने 2002 में गुजरात में “सफल प्रयोग” आयोजित करके या यह दिखाकर कि सीएए-एनपीआर-एनआरसी की त्रयी गोलवलकर और आरएसएस की दृष्टि की परिणति का प्रतिनिधित्व करती है, उसके प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखी।

उनकी एकमात्र समस्या उस दृष्टि की प्रस्तुति को लेकर है। सामाजिक-राजनीतिक महत्व के विभिन्न मुद्दों पर समय-समय पर दिए गए उनके विवादास्पद वक्तव्यों और अनेक अवसरों पर उस “सुनियोजित अस्पष्टता” से आगे निकल जाने को देखते हुए—जो उस संगठन की एक विशेषता थी जिसका उन्होंने निर्माण किया—यह आश्चर्यजनक नहीं है कि हिंदुत्व परियोजना का विरोध करने वाले सभी लोगों के निशाने पर वे हमेशा रहे।

सबसे अच्छी रणनीति यही प्रतीत होती है कि “सार्वजनिक रूप से उन्हें भुला दिया जाए” और व्यवहार में उनके मूल सार को पूरी तरह लागू किया जाए।

(जारी)

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